(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.17. अध्यायः 017
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
अमृतमथनविषये भगवदाज्ञया देवानां विचारः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-17-0x(74)(1161)
एतस्मिन्नेव काले तु भगिन्यौ ते तपोधन।
अपश्यतां समायान्तमुच्चैः श्रवसमन्तिकात्॥ 1-17-1(1162)
यं तु देवगणाः सर्वे हृष्टरूपमपूजयन्।
मथ्यमानेऽमृते जातमश्वरत्नमनुत्तमम्॥ 1-17-2(1163)
अमोघबलमश्वानामुत्तमं जविनां वरम्।
श्रीमन्तमजरं दिव्यं सर्वलक्षणपूजितम्॥ 1-17-3(1164)
शौनक उवाच। 1-17-4x(75)
कथं तदमृतं देवैर्मथितं क्व च शंस मे।
`कारणं चात्र मथने संजातममृतात्परम्॥'
यत्र जज्ञे महावीर्यः सोऽश्वराजो महाद्युतिः॥ 1-17-4(1165)
सौतिरुवाच। 1-17-5x(76)
ज्वलन्तमचलं मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम्।
आक्षिपन्तं प्रभां भानोः स्वशृङ्गैः काञ्चनोज्ज्वलैः॥ 1-17-5(1166)
कनकाभरणं चित्रं देवगन्धर्वसेवितम्।
अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनैः॥ 1-17-6(1167)
व्यालैरावारितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम्।
नाकमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छ्रयेण महागिरिम्॥ 1-17-7(1168)
अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम्।
नानापतगसङ्घैश्च नादितं सुमनोहरैः॥ 1-17-8(1169)
तस्य शृङ्गमुपारुह्य बहुरत्नाचितं शुभम्।
अनन्तकल्पमद्वन्द्वं सुराः सर्वे महौजसः॥ 1-17-9(1170)
ते मन्त्रयितुमारब्धास्तत्रासीना दिवौकसः।
अमृताय समागम्य तपोनियमसंयुताः॥ 1-17-10(1171)
तत्र नारायणो देवो ब्रह्माणमिदमब्रवीत्।
चिन्तयत्सु सुरेष्वेवं मन्त्रयत्सु च सर्वशः॥ 1-17-11(1172)
देवैरसुरसङ्घैश्च मथ्यतां कलशोदधिः।
भविष्यत्यमृतं तत्र मथ्यमाने महोदधौ॥ 1-17-12(1173)
सर्वौषधीः समावाप्य सर्वरत्नानि चैव ह।
मन्थध्वयुदधिं देवा वेत्स्यध्वममृतं ततः॥ ॥ 1-17-13(1174)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सप्तदशोऽध्यायः॥ 17 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-17-9 अनन्तकल्पं अनन्तो विष्णुराकाशो वात तत ईषन्न्यूनम्॥ 1-17-13 वेत्स्यध्वं लप्स्यध्वम्॥ सप्तदशोऽध्यायः॥ 17 ॥


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